भारतीय राजनिती के मौसम वेज्ञानिक गढवाल का चंदन हेमवती नंदन

भारतीय राजनिती के मौसम वेज्ञानिक गढवाल का चंदन हेमवती नंदन


आलेख :-राजेंद्र गोदारा  
भारत की राजनिती के मौसम वेज्ञानिक का जब मैंने पहला भाग लिखा तो तो मेरे एक मित्र ने सवाल किया क्या ये कथित मौसम वेज्ञानिक सिर्फ बिहार में होते है और क्या उनका दलित होना जरूरी है ?
मैंने जवाब में कहा था ये कैसे संभव है जिस देश में राजनिती के कलाकार भरें पड़ें है वहां राजनिती के इस ब्रह्मास्त्र का ज्ञान सिर्फ बिहार तक कैसे सिमित रह सकता है और हजारों जातिगत समूहों वाले देश में सिर्फ दलित किसी विधा के अकेले ज्ञानी कैसे हो सकते है वस्तुत: मेरे दोस्त ने रामविलास पासवान जी के कारण ये सवाल पूछा था उन्हें लालू जी ने मौसम वेज्ञानिक बताया था और जब मैंने पहला मौसम वेज्ञानिक बाबू जगजीवन राम जी को बताया तब उन्हें लगा इस विज्ञान के विशेषज्ञ सिर्फ बिहारी और दलित होना जरुरी है
पर वो भूल जाते है कि इस विधा में सबसे प्रवीण हरियाना वाले निकले है वहीं से गयाराम जी निकले और आयाराम गयाराम की संस्कृति फलिभूत हुई है गयाराम ने तीन दिन मे 17 बार दल बदल किया वो जब दल बदल कर दूसरी पार्टी में गये तो उस पार्टी वालों ने उन्हें आयाराम कहा जब वो कुछ घंटे बाद ही वो पार्टी छोड़ कर चले गये तो उसी पार्टी वाले ने उन्हें गयाराम बताया इस तरह भारत में आयाराम गयाराम का देश में उद्धभव हुआ तो ऐसे देश में सिर्फ बिहार वाले दलित भाई ही कैसे किसी खिताब पर सिर्फ अपना दावा कर सकते है
यहां मेरे कुछ मित्र बहुगुणा जैसे व्यक्ति पर ऐसे कहने का गलत मतलब लगा सकते है पर मैं स्पष्ठ कर दूं यहां मैं उन पर कटाक्ष नहीं कर रहा हूं कोई व्यंग्य वाण नहीं चला रहा हूं यहां मेरे कहने का मतलब सिर्फ इतना है कि कुछ राजनितिज्ञ ऐसे होते है जिन्हें पता होता है पहले से पता होता है कि आगामी चुनाव में क्या होने वला है और वो इस पर अपना निर्णय लेते है खुद का भविष्य सदैव उज्जवल बनाये रखना एक कला है जिसमें जो पारंगत होते है वो मौसम वेज्ञानिक कहलाते है
हेमवती नंदन जी के प्रति मेरे मन में कितनी श्रद्धा है उसका पता पहली ही लाईन गढवाल का चंदन - हेमवती नंदन से चल जाता है क्रांतिकारी विचारों वाले बहुगुणा पर अंग्रेजों 1942 में पांच हजार का इनाम उनके जिंदा या मुर्दा पकड़े जाने पर रखा उस समय इनाम की ये राशी बहुत बड़ी थी गांधी जी से प्रभावित बहुगुणा जी भारत छोड़ो आंदोलन में सक्रिय हिस्सेदारी की 1952,57,62 में वो यूपी से विधायक बन कर संसदिय सचिव उपमंत्री राज्यमंत्री से होकर केबिनेट मंत्री बनें चंद्रभानू गुप्त के नेतृत्व में बनी सरकार में वे गुप्त के सबसे खास जन में गिने जाते थे
राजनिती के गहन जानकार बहुगुणा हमेशा से ही सही निर्णय लेते थे जब इंदिरा जी व मोरार जी देशाई में अंदरुनी संघर्ष चला तो वे हमेशा इंदिरा जी की तरफ रहे 1969 में जब वी वी गिरी व नीलम संजीव रेड्डी के राष्ट्रपति चुनाव में जब कांग्रेस के बड़े बड़े दिग्गज भविष्य को नहीं भाप सकें तब बहुगुणा जी ने गिरी के जीतने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की तभी तो इस चुनाव के बाद इंदिरा गांधी ने बाबू जगजीवन राम को अध्यक्ष व बहुगुणा को पार्टी महासचिव बनाया 
बाबू जी के अलावा बहुगुणा कमलापति त्रिपाठी व चौधरी चरणसिंह का बहुत सम्मान करते थे कहते है अपनी पूरी जिंदगीं में हेमवती नंदन ने अपने पिता के अलावा सिर्फ कमलापति त्रिपाठी के पांव छूए
संजय गांधी को सबक सिखाया -- 1974 के बाद राजनिती में या कांग्रेस में संजय गांधी का बहुत दबदबा था कांग्रेस का हर मुख्यमंत्री संजय से डरता था ऐसे ही एक मोके पर एक सम्मारोह में संजय गांधी की जब धक्केशाही ना चलने देने पर बहुगुणा को 04 मार्च 1974 को यूपी के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा यूपी में तब बहुगुणा बहुत लोकप्रिय थे तब इस इस्तीफें पर बहुत आश्चर्य चकित रहे राजनिती के धुरंधर जानते थे संजय गांधी के आगे किसी की नहीं चलती पर इससे भी ज्यादा आश्चर्य उन्हें तब हुआ जब श्रीमति इंदिरा गांधी ने संजय की गलत करनीं पर बहुगुणा से माफी मांगी और उन्हें फिर से मुख्यमंत्री बनने के लिए राजी किया तब 04 मार्च को इस्तीफा देनेवाले हेमवतघ नंदन ने 05 मार्च 1974 को दोबारा मुख्यमंत्री पद की शपथ ली ये संजय के लिए एक सबक था पर संजय गांधी आजिवन इसे नहीं भूलै और 1980 के चुनाव के बाद उन्होंने इसका बदला लिया और राजनिती के चाणक्य कहे जाने वाले बहुगुणा का राजनितिक कैरियर ही तबाह कर दिया
1977 आते आते गुरु और चेलें बाबू जगजीवन राम व हेमवतीनंदन बहुगुणा दोनों को राजनिती की फिजां बदलती हुई लगी और उन्हें लगा कि इंदिरा गांधी और कांग्रेस सत्ता से बाहर हो सकती है ध्यान दिजीये तब के कांग्रेस के बड़े से बड़े नेता भी ये तो कहते थे की चुनाव में कांग्रेस की सीट कम हो सकती है पर उसे सत्ता से बाहर कोई नहीं कर सकता तब मौसम वेज्ञानिक हेमवतीनंदन बहुगुणा को सत्ता कांग्रेस के हाथ से जाती हुई दिख गई थी तब बाबू जी व बहुगुणा ने कांग्रेस छोड़ दी और अलग पार्टी सीएफडी कांग्रेस फोर डेमोक्रेसी बना ली 
इसके बाद 1977 के चुनाव मे इस सीएफडी ने जनता पार्टी के एक अंग के रुप में लोकदल के चुनाव चिन्ह पर चुनाव लड़ा तब भी उस लहर में भी सीएफडी के खुद के सिर्फ 28 सांसद चुने गये पर मात्र 28 सांसदों के बल पर जनता पार्टी के तीन साल के शासन काल में बाबू जगजीवन राम व हेमवतिनंदन बहुगुणा की तूती बोलती रही 100-100 से अधिक सांसद वाले लोकदल व जनसंघ की उतनी नहीं चलती थी जितनी बाबूजी व बहुगुणा की सीएफडी की चलती थी
1979 आते आते चौधरी चरण सिंह व मोरार जी देशाई में बिल्कुल ठन गई थी तब देशाई की छोटी सी संगठन कांग्रेस जनसंघ व सीएफडी एक तरफ थे और चौधरी साहब अकेले एक तरफ जब जनता पार्टी के सांसदों का लगभग आधा हिस्सा चौधरी चरणसिंह की तरफ हो गया तब राजनिती के मौसम वेज्ञानिक हेमवतीनंदन बहुगुणा ने नेतृत्व परिवर्तन की मांग की तब पूर्व जनसंघ के सांसदों ने बहुगुणा की नहीं चलने दी पर जनता पार्टी टूट चुकी थी और
सिर्फ मौसम वेज्ञानिक हेमवतीनंदन बहुगुणा ही भांप सके की अब सत्ता में कौन आने वाला है मेरी पिछली पोस्ट में प्रथम मौसम वेज्ञानिक का खिताब पाये बाबू जगजीवन राम जो प्रधानमंत्री बनने के हसीन सपने में जो नहीं देख पाये वो उनके चेले बहुगुणा को साफ दिख रहा था और बहुगुणा जी ने पहली बार बाबू जी का साथ छोड़ कर चौधरी चरण सिंह के साथ जाने का फैसला किया
गुरु चंद्रभानु गुप्त की जमानत जब्त --
इस दौरान का एक किस्सा यूपी में बहुत मशहूर है कि हारने के बाद चंद्रभानु गुप्त ने बहुगुणा से कहा 
रे नटवरलाल तूं ने हरवा दिया वहां तक तो ठीक था ये जमानत जब्त करवाने वाली कला कहां से सीखी इस पर बहुगुणा ने जवाब दिया आपके ही चेले है गुरूजी सब आप से सिखा पर चंद्रभानु गुप्त बोले पर हमने तो अपने गुर का सिर्फ 80 प्रतिशत ज्ञान तुझे दिया तो झखोई बाकी कहां से सीखा जवाब में बहुगुणा ने कहा गुरुजी आप तो भूल गये पर30- 40 ज्ञान चेले के पास खुल का भी था जो मिलकर 110-120 प्रतिशत हो गया जिसके आपका सारा 100 प्रतिशत गुर ज्ञान भी कहां ठहरता आपकी जमानत तो जब्त होनी ही थी
फिर खुद को मौसम वेज्ञानिक सिद्ध किया --
1980 के लोकसभा चुनाव आ गये और मौसम वेज्ञानिक हेमवतीनंदन बहुगुणा को मौसम बदलते साफ दिखने लगा तब उन्हें 1974 में संजय गांधी वाली घटना सता रही थी कि संजय उन्हें फिर से कांग्रेस में शामिल नहीं होने देगा पर उधर श्रीमति गांधी ने अपने सभी पुराने साथियों को फिर से कांग्रेस में आने का निमंत्रण दिया और पूरा मान सम्मान देने का वादा किया तब मौसम वेज्ञानिक के लिए मौसम अनुकुल था और वे चौधरी चरणसिंह का साथ छोड़ फिर से कांग्रेसी कहलाने लगे तब श्रीमति गांधी ने उन्हें पार्टी महासचिव बनाया और उत्तरप्रदेश बिहार हरियाणा राजस्थान उड़ीसा पंजाब दिल्ली गुजरात का प्रभार एक तरह से संपूर्ण उत्तर भारत या हिंदीं बेल्ट का पूर्ण प्रभार उन्हें सोंप दिया बहुगुणा ने भी उस चुनाव में डटकर मेहनत की और कांग्रेस ने लोकसभा की 350 सीट जीतकर नया इतिहास बनाया इस चुनाव में बहुगुणा की मेहनत और चौधरी चरण सिंह की तब की लोकप्रियता दर्शाता हुआ बहुगुणा का एक इंटरव्यु
बहुगुणा व चौधरी चरणसिंह की लोकप्रियता --
लोकसभा में 350 सीट जीतने के बाद बहुगुणा ने कहा ये सीटें नहीं दिखा सकती की मुकाबला कितना कड़ा व मुश्कील था सिर्फ 44 सीट जीतने वाले चौधरी चरण सिंह ने हमें नाकों चनें चबवा दिये थे
बहुगुणा ने बहुत स्पष्ट वादिता से कहा ----
इस चौधरी ने हमारा जीना हराम कर दिया हम कैसे उत्तरप्रदेश बिहार राजस्थान व हरियाणा जीते सिर्फ हमें पता है यादवों का छह साल का बच्चा इंट लेकर छाती तान कर हमारी जीप के आगे खड़ा हो जाता था चौधरी चरणसिंह की आलोचना तो दूर अगर हम मैं से कोई उनका नाम भी ले लेता तो ईंट सीधी जीप के विंड स्क्रीन से टकराती और टूटते हुए शीशे से बचने के हमें नीचे छिपना पड़ता
बहुगुणा ने इस इंटरव्यु में साफ कहा उन्होंनें जवाहरलाल नेहरू का समय देखा शास्त्री जी इंदिरा जी यहां तक की लोकनायक जयप्रकाश नारायण सबके साथ काम किया पर 1980 में हिंदी भाषी क्षेत्र में चौधरी चरणसिंह के लिए जो अपनत्व या अपनापन देखा वो किसी अन्य नेता के भाग्य में कभी नहीं लिखा पाया 
1980 में बड़ी जीत और मौसम वेज्ञानिक की तकदीर -- इस बड़ी जीत के बाद बहुगुणा को पता चला कि संजय गांधी कभी किसी बात को नहीं भूलते दरअसल संजय गांधी ने 1974 के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफे के बाद बहुगुणा के अगले दिन फिर मुख्यमंत्री बनने को अपना अपमान माना और बहुगुणा को इंदिरा गांधी सरकार में कोई पद नहीं लेने दिया बहुगुणा मंत्री बनना चाहते थे पर इंदिरा जी ने उन्हें सिर्फ पार्टी या संगठन में काम करने को कहा हालांकि कांग्रेस में महासचिव का पद किसी मंत्री पद से कम नहीं होता पर संगठन में भी संजय गांधी उन्हें आजादी से काम नहीं करने दे रहे थे उनका अपमान किया जा रहा था तब स्वाभीमानी बहुगुणा के लिए कांग्रेस में रहना मुश्कील हो गया तब बहुगुणा ने कांग्रेस पार्टी के साथ सांसद पद से भी इस्तीफा दे दिया हालांकि तब दलबदल कानून नहीं बना था पर बहुगुणा ये भी नहीं कहलवाना चाहते थे कि कोई उन्हें कहें कि वो कांग्रेस को मिले वोटों से सांसद बनें इस कारण भारी जीत के छह महिने बाद ही सांसद से भी इस्तीफा दे डाला
मुख्य चुनाव आयुक्त श्यामलाल शकधर --
आज जनता को मुख्य चुनाव आयुक्त और साफ सुथरे चुनाव के लिए मात्र टी एन शेषन याद आते है पर भारत में अगर पहली बार किसी ने मुख्य चुनाव आयुक्त की शक्ति का अहसास कराया तो वे शकधर थे हुआ यूं कि बहुगुणा ने गढवाल सीट से इस्तीफे के बाद जब दोबारा चुनाव हुआ तो चुनाव हेमवती नंदन बहुगुणा बनाम भारत सरकार हो गया चुनाव में जमकर धांधली हुई सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग हुआ मतदान के दिन जमकर हिंसा हुई बूथ पर कब्जे हुऐ इस पर बहुगुणा ने सबूतों के साथ चुनाव आयोग से शिकायत की और उसी समय सारा प्रेस पत्रकार चकित रह गये जब मुख्य चुनाव आयुक्त श्यामलाल शकधर ने वोटों की गिनती से पहले ही वहां हुए चुनाव को रद्द कर दिया ये भारत में पहला मौका था जब मुख्य चुनाव आयुक्त ने अपने को मिले अधिकारों का उपयोग किया और एक मतदान हो चुके क्षेत्र के मतों की गिनती की बजाय संपूर्ण चुनाव ही रद्द कर दिया
गढवाल सीट से चुनाव की नई तिथी की घौषणा हुई पर अब चुनाव पहाड़ बनाम इंदिरा बन चुका था और संपूर्ण पहाड़ के सामने सरकार ने कहां तक ठहरना था और हेमवतीनंदन बहुगुणा भारी बहुमत से वो चुनाव जीत गये
नेता बनाम अभिनेता --
इंदिरा जी की हत्या के बाद हुए लोकसभा चुनाव में बहुगुणा ने इलाहाबाद से चुनाव लड़ने का फैसला किया यहां वे बहुत लोकप्रिय थे और कहा जाता था इलाहाबाद से हेमवतीनंदन को कोई नहीं हरा सकता मुसलमानों में तो उनकी लोकप्रियता इतनी थी की कहा जाता था वे एकमात्र नेता थे जो मुस्लिमों के सौ प्रतिशत वोट ले सकते थे तब राजीव गांधी ने अपने मित्र सिने अभिनेता अमिताभ बच्चन को राजनिती में आने का अनुरोध किया तब सदी के महानायक इलाहाबाद से चुनाव लड़ा और खुद को छोरा गंगा किनारे वाला बताया जया बच्चन ने खुद को इलाहाबाद की बहू बताया और मूंह दिखाई में अमिताभ को वोट देनें की अपील की इंदिरा जी की हत्या से उपजी सहानुभूति व अमिताभ की लोकप्रियता के आगे बहुगुणा वो चुनाव पौने दो लाख वोटों से हार गये इसी के साथ भारतीय लोकतंत्र के दूसरे मौसम वेज्ञानिक की संसदीय राजनिती भी खत्म हो गई
दूसरों को अंगुलियों के इशारे पर नचाने वाले बहुगुणा आखिर में खुद दूसरों के इशारों पर नाचने लगे -- 
अब तक बहुगुणा ने जितनी भी राजनिती की स्वाभीमान से की दबदबे से की ठरकीपन से की पर अब मात्र 70 की आयु में बहुगुणा बुढाने लग गये इलाहाबाद की हार उन्हें दिल के अंदर तक लगी थी पर उन्होंने राजनिती तो करनी ही थी कांग्रेस छोड़ने के बाद से ही वो अपने अजीज जिसे वो देश का सबसे लोकप्रिय नेता मानते थे उस चरणसिंह के साथ थे तब चौधरी चरणसिंह के लोकदल में मुलायमसिंह यादव लालूप्रसाद यादव व चौधरी देवीलाल भी थे चौधरी चरणसिंह जब तक होंश में रहे तब तक उन्होंने अपने बेटे अजीत सिंह को राजनिती में नहीं आने दिया
पर अब जब चौधरी चरणसिंह ज्यादा अस्वस्थ हो गये या कह सकते है नीम बेहोशीं में चले गये तब मुलायम सिंह यादव लालू यादव व चौधरी देवीलाल के साथ हेमवती नंदन बहुगुणा ने भी कहा कि हम सब और चौधरी चरणसिंह वंशवाद की राजनिती के खिलाफ थे इसलिये हम चौधरी अजीत सिंह के साथ लोकदल में नहीं रह सकते इसलिए हम हेमवतीनंदन बहुगुणा जी को पार्टी अध्यक्ष चुनते है और इस तरह लोकदल ( बहुगुणा ) नाम की पार्टी अस्तीत्व में आई उसने चौधरी अजीत सिंह को पार्टी से निकाल दिया इस तरह लोकदल दो फाड़ हो गया तब अजीतसिंह ने भी लोकदल (अजीतसिंह ) के नाम से अपनी पार्टी बना ली
ध्यान दिजीये वंशवाद कि खिलाफत करने वाले मुलायमसिंह यादव लालुप्रसाद यादव चौधरी देवीलाल व हेमवतिनंदन बहुगुणा के वंशों के आज कितने जन राजनिती में है और परिवारवाद के नाम पर चौधरी अजीतसिंह को बाहर निकालने वाले इन लंबरदारों के आज कितने सदस्य खुद की पार्टी के स्वंयभू कर्त्ता धर्त्ता है मुलायम यादव लालू यादव व चौधरी देवीलाल की खुद की पार्टिंया है जिनमें सिर्फ इनके परिवार के सदस्य ही सिरमौर बन सकते है और इन्हीं सबने मिलकर अपने पार्टी के मुखिया के बेटें को खुद उस मुखिया द्वारा बनाई गई पार्टी से निकाल दिया था
सब समय का फैर है बहुगुणा जी को पार्टी अध्यक्ष बनना भी लंबा नहीं चल सका था और अजीत सिंह को पार्टी से बाहर करने वाले चौधरी देवीलाल मुलायमसिंह यादव व लालू प्रसाद यादव के साथ अजीत सिंह भी अब एक पार्टी एक बैनर एक झंडें के नीचे थे ये 1989 का समय है जब एक बार फिर गैर कांग्रेस सरकार बनने की संभावना है पर उस मौसम की चाल को पहचानने वाला मौसम वेज्ञानिक अब इस दुनिया में नहीं है
Rajender Godara
04 May 2021
साभार :-https://www.facebook.com/rajender.godara.925